गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

जात्रा

विहंगम,अदभुद,अघोर ,
छूटे जीवन की डोर ,
पकड़ने जीवन का छोर,
उन्मुक्त मिलन कि ओर,
हो बांज की ठंडी छाव ,
सूनी अपनी अकेली नाव,
जैसे अंजुली में भरी ,
और फूँक दी तिलांजलि,
है अट्टहास अबूझ काल,


बाल कि खाल,
रह जाए सब बेकार,
बातों का व्यापार ,
मचाए हाहाकार ,
बिखरे वेश ,उलझे केश,
जटा -जूट सहित
ख़त्म हुए देश,
रच ना,बस ना,सज ना
सब अब अपने देश.… 

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

पच्चीसवां साल


उम्र का
 पच्चीसवां साल ,
बिना बात बाल कि खाल ,
जिंदगी की भट्टी में,
दहकता कास्य पदक,
पदक का पता नहीं ,
कांसा जो अब बिकता नहीं,
दीखता है, मंदिरों में,
गुज़रे ज़माने में लगा पैबंद ,
जहाँ जहाँ दीखता कांसा,
अंदर है उसके ध्वस्त ढांचा,
बहरहाल  तीन कम आधा शतक,
किचन के बाहर इठलाती
आखरी बतख,
वक़्त गुज़रा है ऐसे ,
बेफिटी ताश की गड्डी जैसे,
मुकद्दर तय , बेअदब लय
निर्मुक्त,अघोरी,अभय ,
पर
हाथ के छालों में,
गर्म रोटी की सेंक ,
मुद्दा गरम है ,
फेंट सके तो फेंट ,
छालें हैं तो रोटी है,
रोटी नहीं तो
छाले ही सही ,

पर
छाले ही सही तो
रोटी क्यों नहीं … ?