विहंगम,अदभुद,अघोर ,छूटे जीवन की डोर ,
पकड़ने जीवन का छोर,
उन्मुक्त मिलन कि ओर,
हो बांज की ठंडी छाव ,
सूनी अपनी अकेली नाव,
जैसे अंजुली में भरी ,
और फूँक दी तिलांजलि,
है अट्टहास अबूझ काल,

बाल कि खाल,
रह जाए सब बेकार,
बातों का व्यापार ,
मचाए हाहाकार ,
बिखरे वेश ,उलझे केश,
जटा -जूट सहित
ख़त्म हुए देश,
रच ना,बस ना,सज ना
सब अब अपने देश.…




