उम्र का
पच्चीसवां साल ,
बिना बात बाल कि खाल ,
जिंदगी की भट्टी में,
दहकता कास्य पदक,
पदक का पता नहीं ,
कांसा जो अब बिकता नहीं,
दीखता है, मंदिरों में,
गुज़रे ज़माने में लगा पैबंद ,
जहाँ जहाँ दीखता कांसा,
अंदर है उसके ध्वस्त ढांचा,
बहरहाल तीन कम आधा शतक,
किचन के बाहर इठलाती
आखरी बतख,
वक़्त गुज़रा है ऐसे ,
बेफिटी ताश की गड्डी जैसे,
मुकद्दर तय , बेअदब लय
निर्मुक्त,अघोरी,अभय ,
पर
हाथ के छालों में,
गर्म रोटी की सेंक ,
मुद्दा गरम है ,
फेंट सके तो फेंट ,
छालें हैं तो रोटी है,
रोटी नहीं तो
छाले ही सही ,
पर
छाले ही सही तो
रोटी क्यों नहीं … ?


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