बुधवार, 20 नवंबर 2013

इति कुमर कथा

कुमर
छोटा सा 
तिनका तो नहीं
तिनका  ही सही 
जो चिपट आते हैं 
हर कहीं से
आस-पास से ,
मसलन घास से 
जंगल से,सूखे पेड़ से ,
ट्यूववेल वाली मेड़ से ,
बदहोशी- मदहोशी -यायावरी 
में बने रास्तों से
बहरहाल 
ये कुमर है
चुभता है
इसीलिए कुमर है
लेकिन हर चुभती चीज
कुमर नहीं होती
निकालने बैठो
तो
मिल जाते हैं
कुछ पल
मुलाकात होती है
खुद से
फिर  उलझनें कई
सुलझती-लरजती
बिगड़ती -टहलती
खोकर
सुलझ जाती हैं …

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें