गुरुवार, 21 नवंबर 2013

अधूरी कविता

 यूँ तो
 कुमर निकलने में
 बीत जाती है
 पूरी  उम्र ,
 तुम्हें देखता हूँ
 मैं रोज
नौले के पास
कुमर निकालते ,
तुम
जो हंसी ठिठोली में
ढूंढ-बीन कर
 अलग कर देती हो
गहरे से  गहरा
कपड़ों  की परतों में
गहराता
एक-एक कुमर
गोबर में
लिथड़े
अपने पैरों को
नौले के
उस पत्थर पर
घिसते-घिसते,
समय कि कीमत
तुम जानती हो
 या नहीं
ये तो
नहीं जानता
तुम जानती हो
 क्या ?
लेकिन तुम
 जानती हो
गाय के रम्भाने को ,
बछड़े के दर्द को,
तुम कभी नहीं भूलती
भौ के रोने का वक़्त,
जबकि तुम रोकती हो
मुझे
कि वहाँ
मत जाना
कुमर  लग जाएंगे,
फिर तुम तो वहीँ होती हो ,
हमेशा
कुमरो के बीच,
भोर
निकलती हो तुम,
 जब
रात का भूखा बाघ,
लौट रहा होता है ,
अपना
आखिरी दाव आजमाकर
सरहदों के पार ,
मुर्गा भी
झेंपता हुआ
अलसाता  है
कुकरू कू
कुत्ते
अब सो रहे होते हैं
और बाघ
लौट रहे होते हैं
तुम
भी तो होती हो वहीँ
जंगल के पार ,









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